छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ

छत्तीसगढ़ की जनजातियाँ के बारे में जानिए! :

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Upendra Singh,

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छत्तीसगढ़ में कुल 42 प्रकार की जनजातियाँ पाई जाती हैं, जो 161 उप-समूहों में विभाजित हैं छत्तीसगढ़ में बस्तर जिला एक ऐसा जिला है जिसे जनजातियों की भूमि कहा जाता है। छत्तीसगढ़ की अधिकांश जनजातियाँ Proto Australoid प्रकार की हैं सन् 1978-79 में अबूझमाड़िया विकास प्राधिकरण की स्थापना हुई ।
संविधान ने छत्तीसगढ़ की कुल 5 जनजातियों को अत्यन्त पिछड़ा घोषित किया है वे हैं
  • अबूझमाड़िया
  • बैगा
  • कमार
  • कोरबा
  • बिरहोर
  • 1. अबूझमाडिया

    यह जनजाति प्रमुख रूप से वन पठारी और ऊँची पहाड़ियों पर निवास करती है। इसके अलावा यह नारायणपुर तथा भोपालपट्टनम के पहाड़ी क्षेत्र में निवास करते हैं यह गोण्ड जनजाति की उपजाति है। ये स्वयं को मेटाभूमि के नाम से जानते हैं इनका घर बाँस ,मिट्टी तथा लकड़ी के बने होते हैं और चारों ओर से बाड़ से घिरे होते है जिसमें वे सब्जी की खेती करते है। विवाह में युवक-युवतियों के आपसी रजामंदी का विशेष महत्व होता है। परिवार पितृसत्तात्मक होता है। और वे अनेक गोत्रों में बँटे होते हैं। हर गोत्र का अपना टोटम होता है। टोटम एक धार्मिक विश्वास का प्रतीक चिन्ह है । ये पद्दा कृषि यानि स्थानान्तरित खेती करते हैं । इनकी अर्थ व्यवस्था का प्रमुख आधार ही खेती है इसके अलावा ये वनोपज और शिकार पर भी निर्भर रहते हैं। इनके सभी सामाजिक गतिविधियां ओझा के निर्देशों पर आश्रित है। ये अपराध को बहुत बड़ा पाप मानते हैं । इनके त्यौहार को ककसाड़ कहते हैं इस दौरान काकसार नृत्य काफी प्रचलित है। इस पर्व में अबूझमाड़ के नवयुवक-नवयुवतियां अपने जीवनसाथी का चुनाव करते हैं। इस पर्व में गाए जाने वाले गीत को ककसार कहते हैं।

    2. बैगा

    यह जनजाति मैकल पर्वत श्रेणी, कर्वधा, राजनान्दगाँव, मुंगेली बिलासपुर में निवास करती है। घने जंगलों में दुर्गम क्षेत्रों पर बाँस और मिट्टी के बने घरों में रहते हैं। ये सुबह जो नाश्ते के तौर पर लेते हैं उसे बासी कहते हैं। दोपहर के भोजन को पेज और रात्रि के भोजन को बियारी कहते हैं । महिलाएं गोदना शरीर में बनाती है जो इनके लिए एक फैशन के तौर पर होता है। कपची वस्त्र पहनती हैं। बैगा परिवार पितृसत्तात्मक होता है मगर महिलाओं समाज में बराबर सम्मान मिलता है। केवल देवर से ही पुनःविवाह की अनुमति होती है। तथा महिला और पुरूष का एक साथ तिनका तोड़ना तलाक माना जाता है। इनकी अर्थ व्यवस्था वनों पर आधारित होती है। ये स्थानान्तरित खेती करते हैं जिसे बेवारकहा जाता है, इसके अलावा वे खेतों से वनोपज और औषधि एकत्र करना इनका प्रमुख व्यवसाय है। धर्मिक इनका प्रमुख देव बुढ़ा देव होता है जो साल वृक्ष पर निवास करते हैं। ये भूमि की रक्षा हेतु ठाकुर देव तथा बिमारियों की रक्षा हेतु दुल्हा देव की आराधना करते हैं। विशिष्ट व्यक्तियों का ये दाह संस्कार करते हैं। जबकि अन्य को ये दफनाते हैं । करमा इनका प्रमुख नृत्य है जिसे ये विशेष अवसरों पर करना पसंद करते हैं । इसके अलावा विलमा परधौनी और फाग गीत इनमें प्रचलित है।

    3. कमार

    ये जनजाति गरियाबंद, बिन्द्रनवागढ़, राजिम, मैनपुर, देवभेग तथा धमतरी में निवास करती है। ये लोग बस्ती बनाकर नदी के पास अपना बसेरा बनाते हैं। रायपुर संभाग की विशेष पिछड़ी जनजाति है। पहाडों पर रहने वाले कमार पहाड़पटिया और मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग बन्धरिज्जियां कहलाते हैं ये लोग जंगलों में रहते है।इनके घर बाँस, लकड़ी और मिट्टी के बने होते हैं इनका मुख्य भोजन दाल चाँवल और साग हैं । ये सात बर्हिविवाही गोत्रों में बंटे रहते हैं इनके पंचायत प्रधान को कुरहा कहते हैं , इनमें सेवा विवाह, सहपालन विवाह और अपहरण विवाह प्रचलित है। घर में किसी की मौत हो जाने पर कमार जाति के लोग घर छोड़ देते हैं। बैगा जनजाति के लोग विवासों से बँधे होते हैं। ठाकुरदेव, मल्हार देव,ओर दुल्हादेव इनके प्रमुख देवता हैं हरेली और नवाखानी इनके प्रमुख त्यौहार हैं ये मंदिरों में वाद्य यंत्रों पर गेड़ी नृत्य करते हैं । नृत्य के दौरान ये सजते संवरते नहीं हैं ।

    4. कोरवा

    ये जनजाति के लोग सूरजपुर, बलरामपुर,जशपुर, संरगुजा,कोरिया और रायगढ़ जिलों में निवास करती है। इनकी दो प्रजातियां है एक पहाड़ी कोरवा और दूसरी दिहाड़ी कोरवा ये जनजाति कोल जनजाति एक शाखा है। विवाह के बाद नवदंपत्ति को नए मकान में रहने का रिवाज है। पुरूष बण्डी एवं धोती पहनते हैं तो महिलाएं सफेद साड़ी पहनती हैं ये मांसाहारी और शराब के शौकीन होते हैं। चाँवल से बनी शराब को हण्डिया कहते है। साक्षरता का प्रतिशत बहुत ही कम है। ये झूंगा /बेवारी खेती करते है जिसमें जंगलों में दलहन की फसल की जाती है। मृतसंस्कार को नवाधवीतथा क्रियाकर्म को कुमारीभात कहते हैं। नृत्य करते समय पुरूष हथियार पहनते हैं तथा ढोलक की थाप पर नाचते हैं नवाखानी, करमा, देवारी ,सोहराई, होली इनके प्रमुख त्यौहार है। इनके द्वारा 5 वर्ष में एक बार सिंगरी त्यौहार मनाया जाता हैं जिसमें महिलाएँ भिथ्त्त चित्र बनाती हैं। और खेती करने के पहले वृक्षों को छंटाई की जाती है। .

    5. बिरहोर

    ये जनजाति रायगढ़ और जशपुर में निवास करती हैं इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है। समाज में गोत्र बहुविवाह का प्रचलन होता है इनके युवागृह को कीतू ओना कहते हैं । ये जीवीकोपार्जन के लिए मुख्यतः खेती किसानी करते है। धार्मिक रूप से ये प्रकृति पूजक होते हैं फगुआ, राम-नवमी एवं करमा इनके प्रमुख त्यौहार हैं

    ये छत्तीसगढ़ की अत्यन्त पिछड़ी जनजातियों में आते है

    अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियों के बारे में , ये इस प्रकार हैं।

    गोण्ड

    ये मुख्यतः राजनांदगाँव, बस्तर, कांकेर, जगदलपुर और दंतेवाड़ा जिलों में रहते हैं। ये मोटे अनाज से बने भोजन का सेवन करते हैं। इनका समाज पितृसत्तात्मक होता है। और ये मिट्टी तथा घासफूस बने मकानों में रहते हैं। जीविकोपार्जन के लिए ये खेती करते हैं और कृषि कार्यो के अलावा ये दैनिक मजदूरी भी करते हैं। गोण्ड जनजाति की प्रमुख विवाह पद्धति दूध लौटावा, वधु मूल्य विधवा विवाह है। गोण्ड जनजाति अपने घर की दीवारों पर नोहडेरा अलंकरण करते हैं। मृत्यु के तीसरे व दसवें दिन कोज्जी और कुण्डा मिलन संस्कार होता है । इनका प्रमुख व्यवसाय कृषि है मगर ये पशुपालन, मुर्गी पालन और दैनिक मजदूरी भी करते हैं । दंतेश्वरी इनकी प्रमुख देवी है तो दुल्हा देव प्रमुख देवता । मेघनाथ त्यौहार इसी जनजाति में प्रचलित है जिसे वे विपत्तियों के निरकरण करने के तौर पर मनाते हैं। हिन्दु धर्म के प्रभाव के कारण ये हनुमान, शिव-पार्वती ,काली माता की पूजा करते हैं ।

    उराँव

    यह जनजाति सरगुजा, जशपुर, बलरामपुर और रायगढ़ में निवास करती है । ये खेती करते हैं और लकड़ी , मिट्टी और बांस के बने घरों पर रहते हैं। आखेट और पशुपालन भी इनका आय का मुख्य स्रोत हैं। अपने मुखिया को उराँव जाति के लोग धाँगर महतो कहते हैं। यह छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक शिक्षित जनजाति हैं। इस जनजाति के अन्तर्गत गाँव के प्रमुख को माँझी कहते हैं । इस जनजाति के युवाग्रह धुमकुरिया कहते हैं। इनकी प्रमुख देवी सरना देवी जो साल वृक्ष में निवास करते हैं इसीलिए ये साल वृक्ष की पूजा बढ़े ही श्रद्धा से करते हैं। धर्मेश नामक ईश्वर को ये मानते हैं तथा विशेष अवसरों पर सफेद मुर्गी की बलि चढ़ाते हैं , ये कुरूख बोली में संवाद करते है। और खट्टी, सरहुल एवं फाग इनके प्रमुख त्यौहार है।

    माड़िया

    ये बीजापुर,दंतेवाड़ा, बस्तर कोंटा में निवास करते है। इनकी झोपड़ी को सिहारी कहते हैं इनकी उपशाखा को दण्डामी माड़िया कहा जाता है। ये जनजाति मृतक स्तम्भ का निर्माण करती है। और स्मिृति स्तम्भ भी बनाती है जिसे हनालगट्टा कहा जाता है। जात्रा पर्व के दौरान ये गौर नृत्य करते हैं । और नृत्य के दौरान ये बायसन के सींग से बनी एक खास प्रकार की मुकुट पहनते है। उनकी यही खूबी देश-विदेश के पर्यटकों के लिए कौतूहल का विषय है। इसीलिए इन्हें Bison-Horn या दंडामी माड़िया कहते हैं।

    मुरिया

    जनजाति कोण्डागाँव और नारायणपुर क्षेत्र में रहता है। इनमें भगेली विवाह दूध लौटावा विवाह का प्रचलन है। इनका प्रमुख पेय सल्फी है समाज में घोटूल का प्रचलन है । घोटूल एक ऐसी सामाजिक प्रथा है जिसमें नव-युवक युवतियों को एक दूसरे को समझने का भरपूर अवसर दिया जाता है । गाँव के बाहर एक व्यवस्था के तहत नवयुवक-नवयुवतियां मिलते हैं सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। ये बाँस -शिल्प और चित्रकला में निपुण होते हैं। इनके नृत्य को पूस कोलांग कहा जाता है। इस जनजाति के लोग लिंगोपेन, ठाकुरदेव,महादेव की पूजा करते हैं । नवाखानी जात्रा, सेसा इनके प्रमुख त्यौहार हैं और उत्सवों की श्रंखला को ककसार कहते हैं।

    अगरिया

    इस जनजाति के लोग बिलासपुर में मैकाल पर्वत श्रंखला के आसपास अधिकतर निवास करते हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा में आपसी संवाद करते हैं। ये पेशे से लोहार होते हैं और लौह-अयस्क पिघलाने का काम करते हैं।

    कोरकु

    ये जनजाति बिलासपुर सरगुजा, बलरामपुर तथा कोरिया में निवास करती है। इनमें सिडोली प्रथा प्रचलित है जिसमें मृतकों को दफनाया जाता है।इनमें पुर्नविवाह का प्रचलन है इनके जातिय संस्कार को पोथड़िया कहा जाता है। भैना ये रायगढ़ तथा बिलासपुर के ऊपजाऊ इलाकों में रहते हैं। ये अपेक्षाकृत शिक्षित होते हैं और कम रूढ़ी वादी होते हैं।

    बिंझवार

    ये जनजाति बिलासपुर, बलौदाबाजार और सोनाखान क्षेत्र में निवास करती हैं इनकी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी बाली बोलते हैं। राज्य के महान क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह इसी समुदाय के थे । ये सोनाखान स्टेट के जमींदार थे। बिंझवार जनजाति का प्रतीक चिन्ह तीर है। तथा इनके समाज में तीर विवाह का प्रचलन पाया जाता है। ये बारह भाई बेटकर की पूजा करते हैं तथा देवियों में विन्ध्यवासिनी को पूजते हैं । इनकी महासभा को कोटासागर कहते हैं।

    कँवर

    यह रायगढ़, जनजाति, बलरामपुर, सरगुजा, सूरजपूर और बिलासपुर में निवास करती है। ये सदरी और छत्तीसगढ़ी बोली बोलते हैं। सैनिक कार्य के अतिरिक्त कृषि व मजदूरी इनकी आजीविका के मुख्य स्रोत है। ये स्वयं को कौरवों का वंशज मानते हैं। सगराखण्ड इनके मुख्य देवता है।

    खड़िया

    यह जनजाति रायगढ़ और सरगुजा क्षेत्र में रहती है।ये खड़िया बोली बोलते है। बन्दा इनके प्रमुख देवता है। ये पूस,पुन्नी ओर करमा बिरजिया ये सरगुजा क्षेत्र में निवास करते हैं। ये बिरजिया और सदरी बोलीको उपयोग करते हैं। सरहुल, करमा, फगुआ तथा रमनवमी इनके प्रमुख त्यौहार है।

    धनवार

    ये जनजाति बिलासपुर जिले के पहाड़ी इलाकों में निवास करते हैं। धनुष का इस जनजाति में बड़ा महत्व है।

    धुरवा

    ये बस्तर ,कोण्डागाँव, सुकमा व दन्तेवाड़ा में विास करती है। ये स्वयं को पहले प्रजा कहते थे। इनकी मातृ भाषा परजी द्रविड़ भाषा से सम्बद्ध है। ये हल्बी को द्वितीय भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं।

    बिरजिया

    ये सरगुजा जिले में निवास करते हैं। ये बिरजिया और सदरी भाषा का प्रयोग करते हैं। ये सरहुल, करमा, फगुआ तथा रामनवमी जैसे त्योहार मनाते हैं।

    धनवार

    ये बिलासपुर जिले के पहाड़ी क्षेत्र में निवास करती हैं इस जनजाति के समाज में धनुष का विशेष महत्व होता है।

    धुरवा (परजा )

    यह जनजाति बस्तर कोण्डागाँव, सुकमा व दन्तेवाड़ा क्षेत्रों में निवास करती हैं। ये स्वयं को पहले प्रजा कहते थे। इनकी मातृभाषा परजी द्रविड़ भाषा परिवार से सम्बद्ध है । ये हल्बी का प्रयोग द्वितीय भाषा के रूप में करते हैं।

    सौरा

    यह जनजाति रायगढ़ तथा महासमुन्द में निवास करती है। ये स्वयं को शबरी का पूर्वज मानत है। इनका व्यवसाय साँपो पकड़ना है।

    पारधी

    का शब्दिक अर्थ आखेट होता है। इनका निवास रायगढ़, सरगुजा और कोरबा में है।

    कोया / दोरला/ कोयतुर

    बस्तर के गोदावरी क्षेत्र में मिलते हैं। यह गोण्ड वर्ग की उपजाति है।

    मझवार

    ये जनजाति रायगढ़ तथा सरगुजा क्षेत्र में निवास करती है। इन्हें मांझी या माझिया के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं इनकी उत्पत्ति मुण्डा, गोण्ड तथा कँवर जनजाति से हुई है।

    खैरवार

    बिलासपुर, बलरामपुर, सूरजपुर तथा सरगुजा में ये निवास करते हैं। ये क्षैर वृक्ष से कत्था निकालने का कार्य करते हैं।

    परधान

    यह जनजाति बलौदाबाजार, रायपुर और बिलासपुर के क्षेत्रों में निवास करती है। ये गोण्ड राजाओं के वादक और गायक हुआ करते थे। इनके गायन कला को लिंगोपाटा कहते हैं।

    जनजाति और उनके युवागृह

    S.No. जनजाति युवागृह
    1. मुरिया उराँव
    2. उराँव धुमकुरिया,
    4. मुरिया माड़िया घोटुल
    5. बिरहोर गितिओना
    6. धुरवा (परजा ) धागाबक्सर
    7. भारिया रंगबंग
    8. भुईया घसरवासा

    Upendra,
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