History of Chhattisgarh

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प्रागैतिहासिक काल

इसे पाषाण यानि पत्थरों का युग भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय तक मनुष्य केवल पत्थरों से ही औजार बनाना सीख गया था। प्रागैतिहासिक काल इसे पाषाण यानि पत्थरों का युग भी कहा जाता है। क्योंकि इस समय तक मनुष्य केवल पत्थरों से ही औजार बनाना सीख गया था। पाषाण युग को चार भागों में बाँटा गया हैं ।

  • पूर्व पाषाण युग
  • मध्य पाषाण युग
  • उत्तर पाषाण युग और
  • नव पाषाण युग।
  • पूर्व पाषाण युग

    पाषाण युग के अवशेष छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में मिलें हैं। जानते हैं वे कौन कौन सी जगहें हैं जहाँ पाषाण युगीन अवशेष मिले हैं। पूर्व पाषाण युग के अवशेष रायगढ़ की महानदी घाटी एवं सिंघनपुर की गुफा तथा सोनबरसा से प्राप्त हुए हैं। इन स्थलों से पत्थर के औजार भी मिले हैं जिनमें कुदाल प्रमुख है।

    मध्य पाषाण युग

    इस युग के साक्ष्य रायगढ़ की पहाड़ियों में मिले हैं जिसमें कुछ चित्रकारियां मिली हैं । लाल रंग की छिपकली, कुल्हाड़ी, घड़ियाल आदि की चित्रकारी मिली है। इसके अलावा लम्बे औजार भी यहाँ मिले हैं । जो अर्द्धचन्द्राकर छोटे आकार में हैं । पाषाण युगीन घेरे या स्मारक कोण्डागाँव जो गढ़धनोरा से मिले हैं। बालोद के करहीभदर, चिरचारी, सोरर में भी साक्ष्य मिले हैं । जो लगभग 500 की संख्या में हैं ।

    उत्तर पाषाण युग

    इस युग के साक्ष्य महानदी घाटी, बिलासपुर जिले के घनपुर तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर के चित्रित शैलगृहों के पास मिले हैं। छत्तीसगढ़ से लगे हुए उड़ीसा के कालाहांडी, बलांगीर एवं सम्बलपुर जिले की तेल नदी एवं उसकी सहायक नदियों के तटवर्ती क्षेत्र के लगभग 26 स्थानों से इस काल के औजार प्राप्त हुए हैं।

    नव पाषाण युग।

    इस युग में कृषि पशुपालन, और गृहनिर्माण तथा बर्तनों का निर्माण, कपास अथवा ऊँन कातना सीख लिया था। इसके साक्ष्य दुर्ग जिले के अर्जुनी, राजनांदगांव के चितावा डोंगरी,रायगढ़ जिले के टेरम नामक स्थानों से मिले हैं। धमतरी तथा बालोद मार्ग पर लोहे के उपकरण आदि प्राप्त हुए हैं । इससे यह पता चलता है कि उस काल में मनुष्य गुफाओं में चित्रकारी करना जानते थे।

    धन्यवाद

    पाषाण युग के बाद आता है। ताम्र युग या लौह युग आता है।

    वैदिक काल

    शतपथ बा्रम्हण में पूर्व एवं पश्चिम में स्थित समुद्रों का उल्लेख मिलता है , कौषितिकीय उपनिषद् में विन्ध्य पर्वत काउललेख प्राप् होता है । उत्तर वैदिक सात्यि में नर्मदा नदी का उल्लेख रेवा नदी के रूप में मिलता है। करीब 1000 से 600 ई.पूर्व में मे ऐसा माना जाता है कि आर्यो का प्रसार छत्तीसगढ़ में होने लगा था। ऋगवेद काल में छत्तीसगढ़ का कोई उल्लेख नहीं है।

    रामायण काल

    रामायण काल में इसे दक्षिण कोसल कहा जाता था। इसकी राजधानी कुशस्थली थीं इस समय यहाँ की बाली जाने वाली भाषा को कोसली कहते थे। वाल्मिकी रामायण में वर्णन के अनुसार दशरथ का विवाह कौशल्या से हुआ था। जो दक्षिण कोसल के राजा भानुवन्त की पुत्री थी। राजा दशरथ उत्तर कोसल के राजा थे। इस प्रकार श्री राम का छत्तीसगढ़ ननिहाल था। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि कोसल प्रदेश का नाम राजा भनुवन्त के पिता महाकोसल के नाम पर हुआ था। रामायण कालीन प्रमुख स्थल जो छत्तीगढ़ में चिन्हित किए गए हैं । वे हैं सरगुजा जिले में रामगढ़, सीता बेंगरा, लक्ष्मण बेंगरा, शिवरीनारायण जहाँ शबरी रहा करती थी जिसने भगवान श्री राम को वनवास के दौरान अपने जूठे बेर खिलाए थे तुरतुरिया, वाल्मिकी आश्रम जहाँ लव कुश का जन्म हुआ था। सिहावा पर्वत, पंचवटी सीता का अपहरण क्षेत्र व दण्डकारण्य इत्यादि। रामायण कालीन प्रमुख स्थल जो छत्तीगढ़ में चिन्हित किए गए हैं । वे हैं सरगुजा जिले में रामगढ़, सीता बेंगरा, लक्ष्मण बेंगरा, शिवरीनारायण जहाँ शबरी रहा करती थी जिसने भगवान श्री राम को वनवास के दौरान अपने जूठे बेर खिलाए थे तुरतुरिया, वाल्मिकी आश्रम जहाँ लव कुश का जन्म हुआ था। सिहावा पर्वत, पंचवटी सीता का अपहरण क्षेत्र व दण्डकारण्य इत्यादि।

    महाभारत काल

    महाभारत काल में इसका नाम प्रक्कोसल था और बस्तर वाले क्षेत्र को कान्तार कहते थे। सिरपुर को क्षेत्र जिसे चित्रागंदापुर कहा जाता था। यह अर्जुन के पुत्र भब्रुवाहन की राजधानी थी। सिरपुर, रतनपुर,खल्लारी और आरंग पमुख महाभारत कालीन क्षेत्र हैं।

    बौद्ध और जैन धर्म

    सिरपुर प्रमुख रूप से बौद्ध कालीन नगर था। अवदान शतक ग्रन्थ में महात्मा बुद्ध के सिरपुर आने का उल्लेख मिलता है जहाँ वे इसकी राजधानी श्रावस्ती में प्रवास किया और तीन महिने यहाँ रहे। बौद्ध भिक्षु आनन्द ने सिरपुर में स्वास्तिक विहार एवं आनन्द कुटी विहार का निर्माण कराया जो आज भी देखने लायक हैं । ऐसी जानकारी है कि चीनी यात्री हेन सांग का भी यात्रा वृतांत छत्तीसगढ़ के बारे में कुछ कहता है। वहीं जैन धर्म ग्रन्थ भगवती सूत्र के अनुसार कोसल महाजनपद उत्तर कोसल तथा दक्षिण कोसल में बँटा हुआ था।

    महाजनपदकाल

    महाजनपदकाल में भारत 16 महाजनपदों में बँटा हुआ था। वर्तमान छत्तीसगढ़ चेदी महाजनपद में शामिल था और इसकी राजधानी शक्तिमति थी चेदी महाजनपद में होने के कारण इसे चेदसगढ़ कहते थे जो आगे चलकर छत्तीसगढ़ बना जो चेदि गढ़ का अपभ्रंश है। वर्तमान छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल के नाम से एक अलग पृथक इकाई थी जिसकी पुष्टि मौर्यकाल से पूर्व के सिक्कों से होती है। यहाँ मौर्य वंश (322-185) का शासन था।रामगढ़ की पहाड़ी में स्थित जोगीमारा गुफा मौर्यकालीन गुफा है ।इस गुफा में देवदत्त और सुतनुका नृतिका का प्रेमकथा वर्णन मिलता है। इस गुफा में बने चित्र मूर्तियां उत्कृष्ठ उदाहरण है। मौर्ययुगीन साक्ष्य यहाँ सिरपुर, बिलासपुर -चांपा और सरगुजा में मिलते हैं। सिरपुर में अशोक ने एक स्तूप का निर्माण कराया था। दो अभिलेख सरगुजा में मिलते है। जांजगीर-चांपा जिले के ठिठारी और अकलतरा तथा रायगढ़ जिले के बार व तरापुर से मौर्यकालीन सिक्के मिले हैं

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    Siyan Shouts is an attempt to talk about prosperous culture of the newly formed state Chhattisgarh which came into being in 2001. People across the globe throng around the state to catch a glimpse of what it offers. Another aim of the site is to discuss in details of the questions that are expected in various competetive exams being conducted in the state. The information given here is in the form of article and blogs.
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    The ancient evidence of Bhongapal

    It gives vivid picutre of Budhist interference in the area.

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    Gulmi in the border of Chhattisgarh

    Scenic beauty of the place attracts many tourist.

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    Mariya Dance in Bastar

    The dance is performed during certain occasion like wedding and local festival.

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    Jharawada Fall in Dantewada District

    It stands magnificently in the district Dantewada in Chhattisgarh .

    ganesh temple

    Dholkal Ganesh Temple Dantewada

    Located above 1000 metre high in a hill called Dholkal in Dantewada

    waterfall

    Chitrakot Water Fall in Bastar

    located about 40 km away from district headquarter in Bastar in Chhattisgarh.

    Sandwich

    Dantewada Temple in Bastar

    Dantewada is well known for its historical evidence dedicated to Goddess Danteshwari.

    Croissant

    Sculpture in Bastar

    District Bastar is replete with such sculptures. Narayanpur, Barsoor,Dantewada are main attraction

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    Chitrakot Water fall in Jagdalpupr


    waterfall

    Chitrakot Jagdalpur

    full of natural beauty

    Chitrakot is located about 40 km away from district headquarter Jagdalpur in Chhattisgarh.