छत्तीसगढ़ की वन सम्पदा

छत्तीसगढ़ के वनों के बारे में विस्तृत जानकारी :

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छत्तीसगढ़ के जंगल

SiyanShouts, September 17, 2020.

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राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्य

Forest In Chhattisgarh

क्षेत्रफल के दृष्टि से भारत में छत्तीसगढ़ के वनों का तीसरा स्थान है। भारतीय वन प्रतिवेदन 2017 के अनुसार पूरे प्रदेश में 59,772 वर्ग किमी तक वन क्षेत्र फैला हुआ है। जिसमें 55,547 वर्ग किमी भाग पर वन है । छत्तीसगढ़ में प्रषासनिक आधार पर वनों को तीन भागों में बांटा गया है।

आरक्षित वन

आरक्षित वन में वे वन आते हैं जहाँ वृक्षों की कटाई प्रतिबंधित है। सर्वाधिक आरक्षित वन दंतेवाड़ा में है तो न्यूनतम आरक्षित वन कोरबा जिले में हैं। भारतीय वन प्रतिवेदन 2017 के अनुसार छत्तीसगढ़ में 27, 782 वर्ग किमी वन क्षेत्र आरक्षित हैं जो पूरे देश का 44.14 प्रतिशत क्षेत्र है। राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य तथा बायोस्फीयर रिजर्व आरक्षित वन के अन्तर्गत आते हैं।

संरक्षित वन

भारतीय वन प्रतिवेदन 2017 के अनुसार छत्तीसगढ़ में संरक्षित वन 24,036 वर्ग किमी क्षेत्र में है जो पूरे देश का 40.21 प्रतिशत क्षेत्र है। संरक्षित वन में वनों के संरक्षण के साथ वनोपज की गतिविधियां संचालित की जाती है। इन क्षेत्रों में केवल स्थानीय लोगों को ही पशु चराने तथा निजी उपयोग हेते लकड़ियां काटने की अनुमति होती है। तीसरे श्रेणी में अवर्गीकृत वन आते हैं

अवर्गीकृत वन

इन क्षेत्रों में स्थानीय निवासियों को अपने निजी व दैनिक उपयोग हेतु लकड़ी कटाई, पशुओं को चराने की सुविधा दी जाती है। भारतीय वन प्रतिवेदन 2017 के अनुसार 9,954 वर्ग किमी क्षेत्र में प्रदेश में अवर्गीकृत वन हैं। जो पूरे देश का 16.65 प्रतिशत हिस्सा कवर करता है।

वनों के प्रकार

साल वन ,सागौन वन मिश्रित वन

साल वृक्षः

राज्य की अधिकांश जनजाति अपने जीवन निर्वाह के लिए साल वृक्शों पर निर्भर रहती है। राज्य के कुल 40.56 प्रतिशत भाग में साल वृक्ष है। बस्तर को साल वनों का द्वीप कहते हैं राज्य सरकार ने साल वृक्ष को राजकीय वृक्ष घोषित किया है। उत्तम प्रकार के साल वृक्ष केशकाल और कोण्डागाँव में पाए जाते हैं। और इसका विस्तार दक्षिण सरगुजा, गरियाबंद, राजनान्दगाँव, दुर्ग, कांकेर ,बस्तर, जशपुर जिलों में है।

सागौन

राज्य में 9.42 प्रतिशत क्षेत्र सागौन वृक्षों से भरा हुआ है। यह कीमती वृक्षों में से एक है। सबसे उत्तम प्रकार के सागौन नारायणपुर के घुरसेल घाटी में है। इसके अलावा राजनांदगाँव, कबीरधाम, सारगढ़ रेंज और बीजापुर वन मंडल में पाए जाते हैं।

मिश्रित वन

राज्य के 43.52 प्रतिशत वन क्षेत्र में मिश्रित वन पाए जाते हैं। यह दुर्ग, उत्तरी रायपुर, महासमुन्द, सारगढ़, जषपुर, कोरिया आदि वन मण्डलों में मिलते हैं। इस प्रकार के वन क्षेत्र में साल व सागौन वृक्षों के अलावा तेन्दु,बीजा, हल्दू,सलई बेर,सेमलकुसुम, पलास, इमली आदि प्रमुख हैं।

वनोपज

मुख्य वनोपज :

इसमें मुख्यतः लकड़ी से बने उत्पाद और जलाऊ लकड़ी रखा जाता है। इसमें वे लकड़ियां आती जो इमारती कहलाती है। इमारती लकड़ियों में सागौन, खेर, साल, शीशम, बीजा, तथा साजा राज्य में पाई जाती हैं। सबसे अधिक इमारती लकड़ी बस्तर में पाई जाती है।


गौण या लघु वनोपज :

तेंदुपत्ता, खेर लाखख् महुआ, चिरौंजी, आदि गौण या लघु वनोपज में आते हैं। नरबांस या लाठी राज्य में सर्वाधिक पाए जाते है जो राजस्व के लिए प्रदेश के लिए लाभदायक हैं।
तंदु पत्ते को बीड़ी बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। खैर को कत्था बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। भारत में लाख उत्पादन में दूसरा स्थान है यह पलान ,बेर और कुसुम पौधों से बनाया जाता है। रायपुर, सरगुजा,रायगढ़ व बिलासपुर में लाख उत्पादन का कार्य किया जाता है। इसके अलावा बबूल,गोंद, महुआ और आँवला राज्य के गौण वनोपज में आते हैं ।

वन संरक्षण एवं विकास योजनाएं

वन धन विकास योजनाएं

पहला वन धन विकास केन्द्र बिजापुर जिले में बनाया गया है। आदिवासी समाज को प्रेरित करने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने यह योजना लागू की है। इस योजना की शुरूआत 2018 से शुरू की गई है। इस योजना के अंतर्गत महुआ,इमली,भंडारण की जानकारी प्रदान कराने का प्रावधान है।

पौधा प्रदाय योजना

इस योजना की शुरूआत 2017 में हुई है। इस योजना का उद्देश्य वृक्षारोपण को बढ़ावा देना है इसके लिए कम कीमत पर पौधे उपलब्ध कराए जाते है।

हरियाली प्रसार योजना

इस योजना की शुरूआत 2005 -06 में की गई । लघु किसानों को कम कीमत पर विभिन्न इच्छित प्रजाति के 50 से अधिकतम 5000 पौधे प्रति किसान दिए जाते हैं।

इंदिरा हरेली सहेली योजना

यह योजना राज्य सरकार ने जून 2001 में Durg जिले से प्रारम्भ की थी। इस योजनान्तर्गत राज्य सरकार एसी जमीन पर जो उपयोगी नहीं है। सरकारी जमीन पर सीमांत और लघु किसानों को फलदार वृक्ष लगाकर किराए पर दी जाती है।

लाख विकास योजना

राज्य में लाख के विकास,उत्पादन और विपणन पर काम किया जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य कैम्पा

यह वनों के विकास, वन संरक्षण, वन्यप्राणी सुरक्षा तथा प्रबन्धन, अधेसंरचना विकास और प्रबन्ध पर काम करती है।

विश्व खाद्य कार्यक्रम

कमजोर वर्गों के आर्थिक उत्थान,क्षेत्रिय विकास तथा सन्तुलित आहार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सहायोग से शुरू की गई है। वर्तमान में यह योजना बस्तर और बिलासपुर जिले में लागू की गई है। इसके अलावा, नदी तट वृक्षारोपण योजना, स्कूल हर्बल गार्डन, आँवला कैम्पस परियोजना इत्यादि को क्रियान्तिव किया जा रहा है।

वन पुरस्कार

हरिअर छत्तीसगढ़ पुरस्कार

वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए 2018 में इसकी शुरूआत हुई थी। स्वर्गीय मानिकराम गोंड के नाम पर दिया जाता है। उत्कृष्ट वनों के लिए जिला स्तरीय पुरस्कार दिए जाते हैं जो 2000 से 5000 तक दिया जाता है। यह पुरस्कार व्यक्ति, संस्था दोनों को ही दिया जाता है।

महावृक्ष पुरस्कार

यह पुरस्कार सबसे अधिक मोटाई और ऊँचाई वाले वृक्षों के संरक्षण और सर्वधन के लिए ये दिया जता है। इस पुरस्कार के अंतर्गत 25 हजार रूपये और एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है।

वन अपराध की सूचना देने पर

1500 रूपये की पुरस्कार राशि वन अपराध से जुड़े अपराधियों को पकड़वाने में मदद करने के लिए वन विभाग द्वारा दिया जाता है।

अवैध शिकार की सूचना देने पर

यह पुरस्कार वन्य प्राणी के शिकार की सूचना और या शिकार की घटना होने पर सूचना देने वाले व्यक्तियों को प्रोत्साहन स्वरूप दिया जाता है। पुरस्कार की राशि 5 हजार से 50,000 तक दी जाती है। यह पुरस्कार राज्य शासन द्वारा दिया जाता है। वन अपराध को रोकने के लिए वन अपराध व्यूरो तथा विशेष न्यायालय का गठन किया जाएगा।

राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्य

छत्तीसगढ़ में तीन राष्ट्रीय उद्यान और 11 अभ्यारण्य है।

राष्ट्रीय उद्यान क्या है

सभी आरक्षित वन इसके अंतर्गत के अन्तर्गत आते हैं। इस प्रकार के वनों में कटाई, और पशुओं को चराना सख्त मना है। सर्वाधिक आरक्षित वन दंतेवाड़ा में है तो न्यूनतम आरक्षित वन कोरबा जिले में हैं। भारतीय वन प्रतिवेदन 2017 के अनुसार छत्तीसगढ़ में 27, 782 वर्ग किमी वन क्षेत्र आरक्षित हैं जो पूरे देश का 44.14 प्रतिशत क्षेत्र है।

छत्तीसगढ़ में तीन राष्ट्रीय उद्यान हैं वे हैं -

इंद्रवती राष्ट्रीय उद्यानः-

इस उद्यान के बीच इंद्रावती नदी बहती है । इस उद्यान में वन भैंसा, भालू, गौर और सांभर पाए जाते हैं। यह छत्तीसगढ़ राज्य का प्रथम राष्ट्रीय उद्यान है। प्रदेश का प्रथम गेम सेंचुरी कुटरू इसी उद्यान में है। यह उद्यान बीजापुर जिले में स्थित है। इसकी स्थापना 1978 में की गई थी। इसका कुल क्षेत्रफल 1258 वर्ग किमी है । 2009 में इसे टाईगर रिर्जव का दर्जा दिया गया जो राज्य का प्रथम टाइगर रिजर्व है।

कांगेर घाटी:

इसकी स्थापना 22 जुलाई 1982 में हुई थी। इस पार्क में एकमात्र तितली पार्क बनाया गया है जिसे तितली ज़ोन कहते हैं। यह छत्तीसगढ़ राज्य का सबसे छोटा राष्ट्रीय उद्यान है जिसे एषिया का सबसे पहला बायोस्फीयर घोषित किया गया है। यहाँ पहाड़ी मैना जो प्रदेश की राजकीय पक्षी है पायी जाती है। इसके अलावा उड़न गिलहरी, और रिसस बंदर पाए जाते है। यहीं पर भैंसा दरहा नामक स्थान पर प्राकृतिक रूप से मगरमच्छ पाए जाते हैं । इसके बीच से कांगेर नदी बहती है। इस राष्ट्रीय उद्यान का कुल क्षेत्रफल 200 वर्ग किमी है और यह बस्तर जिले में स्थित है। यहीं पर तीरथगढ़ और कोटेमसर की गुफाएं भी हैं। :

गुरू घासी दास राष्ट्रीय उद्यान :

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इसकी स्थापना 1981 में कोरिया व सूरजपुर जिलों में हई थी पूर्व में इसका नाम संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान था मगर छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के साथ ही इसका कुछ हिस्सा मध्यप्रदेश और कुछ छत्तीसगढ़ में आ गया । छत्तीसगढ़ के हिस्से में आए भाग को सन् 2002 में गुरूघासीदास के नाम पर नया नाम दिया गया। इस उद्यान के बीच बनास नदी बहती है। यहाँ बाघ, साम्भर, तेंदुआ और नीलगाय मिलते हैं। और इसका कुल क्षेत्रफल 1441 वर्ग किमी है। इस प्रकार यह प्रदेश का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है। ग्यारह अभ्यारण्य है


Bilaspur के दर्शनीय स्थल

कनन पेण्डारी ( वन्य प्राणी संरक्षण गृह एवं उद्यान विवेकानंद उद्यान ) श्री दीनदयाल उपाध्याय स्मृति वन व्यापार विवार , श्री अयप्पा स्वामी मंन्दिर ,काली मंदिर (तिफरा), आदि हैं। रतनपुरा यह एतिहासिक, धर्मिक स्थल है। बिलासपुर से लगभग 25 किमी की दूरी पर बिलासपुर कटघोरा, मार्ग पर रतनपुर स्थित है। यह तालाबों और मंदिरों से भरा एक धार्मिक नगर है।



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